परानिधेश भारद्वाज,
भिण्ड। अटेर क्षेत्र के परा ग्राम स्थित अमन आश्रम परिसर में शारदीय नवरात्रि पर्व के अवसर पर आयोजित श्रीरामकथा ज्ञानयज्ञ का समापन आध्यात्मिक और प्रेरणादायी प्रवचनों के साथ हुआ। कथा के अंतिम दिन पूज्यपाद अनंतश्री विभूषित श्री काशीधर्मपीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी नारायणानंद तीर्थ जी महाराज ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि मनुष्य एक चिंतनशील प्राणी है और उसका वास्तविक विकास गहन चिंतन, सत्य की खोज तथा आत्मबोध से होता है।
उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति केवल खाने, पीने और सोने तक ही अपना जीवन सीमित रखता है, वह मनुष्य होकर भी पशु के समान जीवन व्यतीत करता है। मनुष्य ने अपनी बुद्धि और चिंतन के बल पर ज्ञान, विज्ञान, कला, धर्म और संस्कृति का निर्माण किया है, जो मानव सभ्यता की अमूल्य धरोहर है।
शंकराचार्य जी ने कहा कि भारतीय ऋषियों ने प्रकृति की गोद में रहकर केवल बौद्धिक चिंतन ही नहीं किया, बल्कि साधना के माध्यम से शाश्वत सत्य का साक्षात्कार किया। उनके आत्मानुभव ही वैदिक मंत्रों के रूप में प्रकट हुए, जिनका सार उपनिषदों में समाहित है। उन्होंने बताया कि वैदिक धर्म संपूर्ण मानवता के कल्याण का मार्ग है। इसका कोई एक प्रवर्तक नहीं है और यह अनादि एवं सनातन है।
उन्होंने कहा कि जिस प्रकार समस्त सृष्टि में एक दिव्य चेतना विद्यमान है, उसी प्रकार प्रत्येक जीव के भीतर भी वही परम तत्व विद्यमान है। मनुष्य साधना, आत्मानुशासन और आत्मचिंतन के माध्यम से उस परम तत्व का साक्षात्कार कर सकता है। आत्मसाक्षात्कार ही परमात्मा का दर्शन है और यही मानव जीवन की सफलता तथा सार्थकता का सर्वोच्च लक्ष्य है। कथा के समापन अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे और शंकराचार्य जी के प्रवचनों का श्रवण कर आध्यात्मिक प्रेरणा प्राप्त की।

