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October 24, 2026
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धर्मभिण्ड

तीर्थंकरों का नाम जितना महान है चरित्र उससे भी महान है- श्री पुष्पदंत सागर जी महाराज

भिण्ड, पवन शर्मा

भिंड। तीर्थंकर के जन्म की सूचना स्वर्ग के इंद्रो, राजा महाराजा से पूर्व प्रकृति को मिलती है और वह झुमने लगती है। फूल खिलने लगते हैं फलो में मिठास भर जाती है। क्योंकि दुनिया में ऐसी आत्मा जन्म लेने वाली है जिसके आने पर धर्म तीर्थ की स्थापना होगी। तीर्थंकर को जन्म देकर उसकी मां तीसरे भाव में निर्वाण को प्राप्त करने की भूमिका बना लेती है। जो शचि इंद्राणी तीर्थंकर बालक का स्पर्श करती है एक जन्म और धारण करें निर्वाण को प्राप्त कर लेती है।

गणाचार्य श्री पुष्पदंत सागर जी महाराज ने चंद्रप्रभ जन्म कल्याणक महा महोत्सव के अवसर पर महावीर कीर्ति स्तंभ परिसर में धर्म सभा को संबोधित करते हुए आगे कहा अपने सपनों को तो सभी पूरा करते हैं मगर जो दूसरों के सपनों को पूरा करता है वह इस दुनिया में तीर्थंकर के नाम से जाना जाता है। तीर्थंकर जीवन को ही सार्थक नहीं बनाते उन के नाम को भी सार्थक करते हैं। दुनिया में जिसके नाम रखे जाते हैं उनके अंदर नाम के अनुसार गुण भले ना हो मगर तीर्थंकर यथा नाम तथा गुण होते हैं। तीर्थंकर अपनी मां के इकलौती संतान होते। तीर्थंकर स्वयं तो जगत पूज्य बनते हैं जन्म देने वाले माता-पिता को भी जगत पूज्य बना देते हैं। पारस मणि का जो लोहा स्पर्श करता है वह भी सोना बना जाता है। तीर्थंकर चंद्रप्रभु पारस मणि के समान थे। सुलक्ष्णा माता के कोख से जन्म प्राप्त कर सम्मेद शिखर निर्वाण प्राप्त किया। तीर्थंकरों का जन्म होने के पश्चात सुमेरु पर्वत पर 1008 कलशो से जन्म अभिषेक के लिए सौधर्म ले जाता है। यह इस बात की तरफ इशारा है जिस तरह से सुमेरु पर्वत सबसे ऊंचा पर्वत है उसी प्रकार की भगवान दुनिया के सब ऊंचे पद पर विराजमान होकर दूध की तरह मिठास से भरे हुए वचनों के द्वारा जगती का उद्धार करने वाले 1000 नेत्र बनाकर भगवान के दिव्य रुप को सौधर्म इंद्र देखता है फिर भी त्रप्त नहीं होते नेत्र। भगवान बनने के लिए सब कुछ छोड़ना पड़ता है जो सब कुछ छोड़ता है वही सब कुछ पाता है।


इस अवसर पर आचार्य श्री सौरभ सागर जी महाराज ने कहा नारी जिसकी दुनिया आभारी है वह चाहे तो मुर्दों में प्राण फूंक सकती है। ब्रह्मांड को हिला सकती है इतना ही नहीं मैं तीर्थंकर बालक हूं गोद में खिला सकती। तीर्थंकर महान है मगर उनको जन्म देने वाली मां उस से पहले महान। अगर सुलक्ष्णा माता न होती तो चंदप्रभ तीर्थंकर के दर्शन कैसे होते हैं। दर्शन का पुण्य तो हमेशा प्राप्त होता है मगर स्पर्श का पुण्य भगवान के अभिषेक और मुनियों की सेवा के समय ही प्राप्त होता हैं।


प्रातः काल बेला में भगवान चंद्रप्रभु का जन्म कल्याण के पावन दृश्य दिखाए गए महावीर कीर्ति स्तंभ परिसर में विशाल सभा मंडप आज तो बधाई माता सुलक्ष्णा के महिल में आदि गीतों झूम उठा। गणाचार्य महाराज के द्वारा जन्म के 1-1 दृश्यों पर विशेष व्याख्या सुनकर उपस्थित श्रद्धालु मंत्रमुग्ध हो उठे।
चंद्रप्रभु तीर्थंकर का विशेष मंत्रों के द्वारा अभिषेक किया गया।
प्रातः सर्वप्रथम क्रांतिवीर प्रतीक सागर जी महाराज द्वारा देश समाज परिवार सुख शांति समृद्धि के लिए जिनेंद्र भगवान के मस्तक पर बीज मंत्रों का उच्चारण करें शांति की प्रार्थना की गई।

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