परानिधेश भारद्वाज,
भिण्ड। अटेर क्षेत्र के परा ग्राम स्थित अमन आश्रम परिसर में आयोजित श्रीरामकथा ज्ञानयज्ञ के दौरान काशीधर्मपीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी नारायणानंद तीर्थ जी महाराज ने कहा कि स्वार्थ और संकीर्णता से ऊपर उठकर परमात्मा की भावना से निष्काम कर्म करना ही वास्तविक यज्ञ है। उन्होंने कहा कि कर्म करने से मनुष्य में कार्यकुशलता और आत्मविश्वास का विकास होता है तथा सनातन धर्म में निष्काम कर्म का सर्वोत्तम उदाहरण भगवान श्रीराम का जीवन है।
उन्होंने कहा कि 14 वर्ष के वनवास का कठोर समय आने पर भी भगवान श्रीराम के मन में किसी प्रकार का दुःख नहीं आया। उनके आदर्श जीवन, त्याग और मर्यादा के कारण आज भी पूरे विश्व में उनकी पूजा की जाती है।
जगद्गुरु शंकराचार्य ने कहा कि अधिकांश लोग यज्ञ का वास्तविक अर्थ नहीं समझते। यज्ञ केवल अग्नि में आहुति देने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका अर्थ सत्संग, देवपूजन, दान और जीवन में अनुशासन स्थापित करना भी है। उन्होंने कहा कि यज्ञशील व्यक्ति का जीवन नियम, संयम और मर्यादा से युक्त होता है, जबकि केवल पुस्तकीय ज्ञान प्राप्त कर लेने से जीवन में अनुशासन नहीं आता।
उन्होंने बताया कि यज्ञ का मूल तत्व त्याग और उत्सर्ग है। यज्ञ से समाज के प्रत्येक व्यक्ति को उसकी पात्रता के अनुसार लाभ मिलता है। ईश्वर ने मनुष्य को धरती, जल, अग्नि और आकाश जैसी अमूल्य प्राकृतिक संपदाएं प्रदान की हैं। इसलिए जिस प्रकार मनुष्य प्रकृति से ग्रहण करता है, उसी प्रकार उसे समाज और प्रकृति को लौटाने का भी भाव रखना चाहिए। यही यज्ञ का वास्तविक स्वरूप है। उन्होंने सभी लोगों से अपनी आय का दशमांश दान करने तथा सेवा और परोपकार के कार्यों में योगदान देने का आह्वान किया।
अपने प्रवचन में शंकराचार्य जी ने अहंकार को मनुष्य के पतन का प्रमुख कारण बताते हुए कहा कि अहंकार की संतुष्टि या प्रसिद्धि की लालसा से किए गए दान और शुभ कर्म भी दोष उत्पन्न करते हैं। लोकप्रियता और सम्मान पाने की इच्छा से किया गया सत्कर्म अंततः मनुष्य को अधोगति की ओर ले जाता है। अहंकार से प्रेरित व्यक्ति के मन में सच्ची सद्भावना नहीं होती और वह कभी वास्तविक शांति प्राप्त नहीं कर सकता।
उन्होंने कहा कि जब अहंकार से उत्पन्न इच्छाओं की पूर्ति में बाधा आती है तो वही घृणा और क्रोध का रूप धारण कर लेती है। ईर्ष्या, द्वेष और घृणा मनुष्य के मन को विषाक्त बना देते हैं और उसके पतन का कारण बनते हैं। उन्होंने रामायण का उदाहरण देते हुए कहा कि बाली और सुग्रीव के बीच का संघर्ष भी घृणा और अहंकार का परिणाम था। ऐसे विकार मनुष्य को असहिष्णु बनाकर समाज से दूर कर देते हैं, इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को निष्काम भाव, सेवा, त्याग और सद्भाव के मार्ग पर चलना चाहिए।

