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October 31, 2026
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धर्मभिण्ड

धन संग्रह से मिथ्या संतोष, जबकि दान से होती है आत्म सुख की प्राप्ति- शंकराचार्य

परानिधेश भारद्वाज,

भिण्ड। नगर स्थित मंशापूर्ण गौशाला परिसर में चल रहे आध्यात्मिक प्रवचन में अनंतश्री विभूषित श्री काशीधर्मपीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी नारायणानंद तीर्थ महाराज ने प्रवचन सुनते हुए कहा कि यज्ञ और तप की भाँति दान भी सात्विक, राजस और तामस होता है। दान देना मानव का कर्त्तव्य है। ऐसा निश्चय करके प्रत्युपकार की इच्छा और आशा से विमुक्त होकर तथा देश, काल और पात्र का औचित्य देखकर दिया हुआ दान सात्विक होता है। प्रत्युपकार की इच्छा और आशा से दिया हुआ दान उत्तम होकर भी राजस होता है। देश, काल और पात्र का बिना विचार किये तथा तिरस्कार करके दिया हुआ दान तामस होता है ।

वास्तव में दान देना समाज पर उपकार करना नहीं है, बल्कि समाज के प्रति अपना ऋण चुकाना है । दान के लिए त्याग की भावना दान को उदात्त बना देती है। व्यक्तियों के परस्पर त्याग द्वारा ही समाज का विकास होता है। दान से समाज और संस्कृति की रक्षा होती है तथा व्यक्ति का जीवन कृतार्थ होता है। धन की तीन गतियाँ हैं – उत्तम गति दान, मध्यम गति भोग तथा अधम गति नाश है। उत्तम पुरूष दान के लिए धन का अर्जन करते हैं, उत्तम पुरुष विनम्र होकर यथासंभव गुप्त दान देते हैं। गुप्त दान प्रकट दान की अपेक्षा अधिक चित्त शुद्धि कारक एवं अनंत फलप्रद होता है। जैसे धरती में बोया हुआ बीज गुप्त रहने पर ही अंकुरित होता है तथा एक से अनंत हो जाता है।
“महापुरूषों का चरित्र विचित्र होता है, वे लक्ष्मी को तृण के समान तुच्छ समझते हैं, किंतु लक्ष्मी प्राप्त होने पर विनम्रता से झुक जाते हैं ।” त्यागवृत्ति से धन की शोभा है। श्रेष्ठ धनिकजन देवालय, आश्रम, औषधालय, अनाथालय, पुस्तकालय, विद्यालय तथा इत्यादि के निमार्ण द्वारा धन का सदुपयोग करते हैं। मनुष्य को अपनी भोगवृत्ति पर नियंत्रण करके उदारता पूर्वक समाजसेवा द्वारा आत्मकल्याण करना चाहिए। परिश्रम पूर्वक प्रचुर धन कमाना एक गुण है और न ही इसमें कोई दोष ही है, किंतु धन का दान तथा उचित भोग न होने पर वह नष्ट हो जाता है। प्रकृति मानव को निरंतर त्याग पूर्वक भोग एवं दान का संदेश देती है। नदी अपना जल स्वयं नहीं पी लेती, वृक्ष अपने फल स्वयं नहीं खा लेते, मेघ अन्न कोष स्वयं नहीं खा लेते। उत्तम पुरूष की विभूति परोपकार के लिए होती है। प्रकृति के साथ निवृत्ति होने पर ही कल्याण होता है ।

पूज्य शंकराचार्य ने कहा कि, कहा जाता है कि गधा अधर्म का रूप है, क्योंकि इसके पैर में एक ही पारी होती है तथा गौ धर्म का रूप है, क्योंकि उसके पैर में दो पारियाँ होती हैं । ग्रहण और त्याग शाश्वत युगल हैं। मनुष्य की महानता और आंतरिक बल का परिचय उसकी त्याग भावना से ही मिलता है । धन संग्रह से मनुष्य को मिथ्या संतोष मिल सकता है, किंतु आंतरिक तृप्ति नहीं मिलती। आंतरिक तृप्ति तो त्याग से ही प्राप्त होती है। जलाशयों में भरा हुआ जल भी सूख जाता है, किंतु आहुति और दान में दिया हुआ द्रव्य वैसे ही स्थिर रहता है। मैं-मैं कहने वाले अभिमानी मनुष्य को कालरूप भेड़िया खा जाता है और सब धन यहीं रह जाता। जीवन रूपी पुस्तक ही सभी पुस्तकों में सर्वोत्तम है तथा जीवन से सत्य और प्रेम का पाठ सीखकर उसका आचरण करना चाहिए। उत्तम पुरूष भोगवृत्ति के शमन तथा त्याग वृत्ति के विकास द्वारा जगत का हित एवं आत्म कल्याण करने में तत्पर रहते हैं ।

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